कुछ सनअत ओ हिरफ़त पे भी लाज़िम है तवज्जोह आख़िर ये गवर्नमेंट से तनख़्वाह कहाँ तक

“To arts and industry as well, attention must be lent; how long can one rely upon a stipend from the government?”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

उद्योग और दस्तकारी पर भी ध्यान देना ज़रूरी है, आख़िर सरकार से मिलने वाले वेतन पर कब तक निर्भर रहा जा सकता है?

विस्तार

इस शे'र में अकबर इलाहाबादी अपने ख़ास तंज़िया अंदाज़ में अपनी क़ौम को आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ा रहे हैं। वे कहते हैं कि सिर्फ़ सरकारी नौकरी और बंधी-बंधाई तनख़्वाह पर निर्भर रहने के बजाय हमें हुनर, दस्तकारी और उद्योग-धंधों को भी अपनाना चाहिए। यह शेर ग़ुलामी के दौर में सिर्फ़ मुलाज़िमत ढूंढने की मानसिकता पर चोट करता है और अपने पैरों पर खड़े होने की प्रेरणा देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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