“Not a single drop is destined for the wealthy man, of the rain that pours down upon the beggars.”
जो बारिश फकीरों पर बरसती है, उस की एक बूँद भी अमीर आदमी को नसीब नहीं होती।
इस शे'र में शायर ने दुनियावी दौलत और रूहानी रहमत के फ़र्क़ को बड़े ख़ूबसूरत अंदाज़ में बयां किया है। यहाँ 'मेंह' यानी बारिश असल में ईश्वर की कृपा या मोहब्बत की उस बहार का प्रतीक है, जो सिर्फ़ उन आजिज़ फ़कीरों पर बरसती है जो खाली हाथ लिए खड़े हैं। जो अपनी दौलत के ग़ुरूर में खोए हैं, वे इस रहमत की एक बूँद को भी तरस जाते हैं; क्योंकि दिली सुकून और रूहानी दौलत ख़रीदी नहीं जा सकती, सिर्फ़ झुककर पाई जा सकती है।
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