“Heap not curses upon me, what comes of such ill grace? You will have to yield a kiss, why wear a sullen face?”
मुझे गालियाँ मत दो, इतना बुरा स्वभाव दिखाने से क्या हासिल होगा? तुम्हें चुंबन तो देना ही पड़ेगा, फिर यह मुँह फुलाने या त्योरियाँ चढ़ाने से क्या फ़ायदा?
इस शेर में आशिक़ और महबूब के दरमियान की एक बेहद शोख़ और प्यारी नोक-झोंक दिखाई देती है। शायर बड़े लाड और हक़ से कहता है कि यूँ मुँह फुलाकर बैठने या गालियाँ देने से कोई फ़ायदा नहीं होने वाला, आख़िरकार मोहब्बत का यह नज़राना तो तुम्हें देना ही पड़ेगा। यहाँ महबूब की यह बेरुख़ी और तल्ख़ी कोई असली नफ़रत नहीं, बल्कि इश्क़ का वो नाज़-ओ-अंदाज़ है जो इसरार को और भी हसीन बना देता है।
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