ग़ज़ल
रुख़ जो ज़ेर-ए-सुंबल-ए-पुर-पेच-ओ-ताब आ जाएगा
رخ جو زیر سنبل پر پیچ و تاب آ جائے گا
यह ग़ज़ल महबूब के घुंघराले गेसुओं और उसके नूरानी चेहरे के सौंदर्य का चित्रण करने के साथ-साथ प्रेम में प्रतीक्षारत दिल की बेकरारी को व्यक्त करती है। इसमें क़ासिद से संदेश जल्द लाने की गुज़ारिश और ख़त के जवाब से मिलने वाले सुकून की तीव्र उम्मीद को बयां किया गया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
रुख़ जो ज़ेर-ए-सुंबल-ए-पुर-पेच-ओ-ताब आ जाएगा
फिर के बुर्ज-ए-सुंबले में आफ़्ताब आ जाएगा
2
तेरा एहसाँ होगा क़ासिद गर शिताब आ जाएगा
सब्र मुझ को देख कर ख़त का जवाब आ जाएगा
3
हो न बेताब इतना गर उस का इताब आ जाएगा
तू ग़ज़ब में ऐ दिल-ए-ख़ाना-ख़राब आ जाएगा
4
इस क़दर रोना नहीं बेहतर बस अब अश्कों को रोक
वर्ना तूफ़ाँ देख ऐ चश्म-ए-पुर-आब आ जाएगा
5
पेश होवेगा अगर तेरे गुनाहों का हिसाब
तंग ज़ालिम अरसा-ए-रोज़-ए-हिसाब आ जाएगा
6
देख कर दस्त-ए-सितम में तेरी तेग़-ए-आबदार
मेरे हर ज़ख़्म-ए-जिगर के मुँह में आब आ जाएगा
7
अपनी चश्म-ए-मस्त की गर्दिश न ऐ साक़ी दिखा
देख चक्कर में अभी जाम-ए-शराब आ जाएगा
8
ख़ूब होगा हाँ जो सीने से निकल जाएगा तू
चैन मुझ को ऐ दिल-ए-पुर-इज़्तिराब आ जाएगा
9
ऐ 'ज़फ़र' उठ जाएगा जब पर्दा-ए-शर्म-ओ-हिजाब
सामने वो यार मेरे बे-हिजाब आ जाएगा
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