ग़ज़ल
सब रंग में उस गुल की मिरे शान है मौजूद
سب رنگ میں اس گل کی مرے شان ہے موجود
यह ग़ज़ल ईश्वरीय महबूब की सर्वव्यापकता को उजागर करती है, जिसकी शान और सौंदर्य सृष्टि के हर रंग तथा हर पल में उपस्थित है। इसमें सूफ़ी भाव के साथ अचेत व्यक्ति को दृष्टि खोलने और संपूर्ण कायनात में ईश्वरीय उपस्थिति का अनुभव करने का आध्यात्मिक संदेश दिया गया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
सब रंग में उस गुल की मिरे शान है मौजूद
ग़ाफ़िल तू ज़रा देख वो हर आन है मौजूद
2
हर तार का दामन के मिरे कर के तबर्रुक
सर-बस्ता हर इक ख़ार-ए-बयाबान है मौजूद
3
उर्यानी-ए-तन है ये ब-अज़-ख़िलअत-ए-शाही
हम को ये तिरे इश्क़ में सामान है मौजूद
4
किस तरह लगावे कोई दामाँ को तिरे हाथ
होने को तू अब दस्त-ओ-गरेबान है मौजूद
5
लेता ही रहा रात तिरे रुख़ की बलाएँ
तू पूछ ले ये ज़ुल्फ़-ए-परेशान है मौजूद
6
तुम चश्म-ए-हक़ीक़त से अगर आप को देखो
आईना-ए-हक़ में दिल-ए-इंसान है मौजूद
7
कहता है 'ज़फ़र' हैं ये सुख़न आगे सभों के
जो कोई यहाँ साहिब-ए-इरफ़ान है मौजूद
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