“Honor, O Zafar, both the Sacred Five and the Companions Four; for in the high assembly of the Faith, exalted are these four or five.”
ऐ ज़फ़र, तुम पंजतन और चार यार दोनों का आदर करो और उन्हें मानो, क्योंकि धर्म की महफ़िल के मुख्य अगुआ यही चार-पाँच हैं।
इस शेर में बहादुर शाह ज़फ़र बड़े ही प्यार और सुलझे हुए अंदाज़ में आपसी एकता और अक़ीदत का पैग़ाम देते हैं। वे कहते हैं कि इस्लाम की रूहानी महफ़िल में 'पंज-तन' (पैगंबर मुहम्मद और उनका अहले-बैत) और 'चार-यार' (चारों खुलफ़ा-ए-राशिदीन) दोनों ही आला मक़ाम पर हैं। ज़फ़र हमें याद दिलाते हैं कि बिना किसी तफ़रीक़ या मतभेद के, इन सभी मुक़द्दस हस्तियों का एहतराम ही दीन की महफ़िल की असली शान है।
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