वो सौ सौ अठखटों से घर से बाहर दो क़दम निकले बला से उस की गर उस में किसी मुज़्तर का दम निकले

“With a hundred coy pretenses, scarce two paces from home she strode; what cared she if, in that fleeting breath, a restless lover's life was lost?”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

महबूब सौ तरह के नाज़-ओ-नखरों के साथ घर से बाहर सिर्फ़ दो क़दम ही निकला; उसे क्या फ़र्क़ पड़ता है अगर इस बीच किसी तड़पते हुए आशिक़ का दम निकल जाए।

विस्तार

इस शेर में महबूब की दिलकश शोख़ी और उसकी बेपरवाही का बड़ा प्यारा मंज़र खींचा गया है। महबूब सौ नख़रों और बहानों के बाद घर की दहलीज़ से बस दो क़दम ही बाहर निकलता है। उसके लिए तो यह महज़ एक नाज़-ओ-अंदाज़ है, लेकिन उसके दीदार के लिए तड़पते हुए बेचैन आशिक़ की इस इंतज़ार में जान पर बन आती है। यह शेर मोहब्बत की उसी मीठी तकलीफ़ को बयां करता है जहाँ महबूब की ज़रा सी अदा भी आशिक़ के लिए ज़िंदगी और मौत का सवाल बन जाती है।

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