मिरे मज़मून-ए-सोज़-ए-दिल से ख़त सब जल गया मेरा क़लम से हर्फ़ जो निकले शरर ही यक-क़लम निकले

“The burning sorrow of my heart consumed the page entire; each word that issued from the pen burst forth as sparks of fire.”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

मेरे दिल के दर्द और जलन के बयान से मेरा पूरा ख़त जल गया, क्योंकि क़लम से जो भी लफ़्ज़ निकले वे सब के सब चिंगारियाँ बनकर निकले।

विस्तार

शायर यहाँ अपने दिल के दर्द और विरह की तपन को बड़े ही नाटकीय और खूबसूरत अंदाज़ में पेश कर रहा है। वह कहता है कि मेरे दिल की आग इतनी तेज़ थी कि जब मैंने ख़त लिखना चाहा, तो क़लम से अल्फ़ाज़ की जगह चिंगारियाँ फूट पड़ीं और पूरा काग़ज़ जलकर ख़ाक हो गया। यहाँ 'क़लम' और 'यक-क़लम' (पूरी तरह/एकाएक) का लफ़्ज़ी खेल उस बेकाबू जज़्बे को दिखाता है जिसे कागज़ पर समेट पाना नामुमकिन था।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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