ग़ज़ल
ज़ुल्फ़ जो रुख़ पर तिरे ऐ मेहर-ए-तलअत खुल गई
زلف جو رخ پر ترے اے مہر طلعت کھل گئی
यह ग़ज़ल इश्क़ की बेपनाह शिद्दत और आशिक़ की तक़दीर के दर्द को उजागर करती है। महबूब के हुस्न और लैला-मजनूँ की रूहानी मुहब्बत के हवाले से शायर ने हिज्र, बेबसी और इश्क़ के गहरे जज़्बातों को बयां किया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
ज़ुल्फ़ जो रुख़ पर तिरे ऐ मेहर-ए-तलअत खुल गई
हम को अपनी तीरा-रोज़ी की हक़ीक़त खुल गई
2
क्या तमाशा है रग-ए-लैला में डूबा नेश्तर
फ़स्द-ए-मजनूँ बाइस-ए-जोश-ए-मोहब्बत खुल गई
3
दिल का सौदा इक निगह पर है तिरी ठहरा हुआ
नर्ख़ तू क्या पूछता है अब तो क़ीमत खुल गई
4
आईने को नाज़ था क्या अपने रू-ए-साफ़ पर
आँख ही पर देखते ही तेरी सूरत खुल गई
5
थी असीरान-ए-क़फ़स को आरज़ू परवाज़ की
खुल गई खिड़की क़फ़स की क्या कि क़िस्मत खुल गई
6
तेरे आरिज़ पर हुआ आख़िर ग़ुबार-ए-ख़त नुमूद
खुल गई आईना-रू दिल की कुदूरत खुल गई
7
बे-तकल्लुफ़ आए तुम खोले हुए बंद-ए-क़बा
अब गिरह दिल की हमारे फ़िल-हक़ीक़त खुल गई
8
बाँधी ज़ाहिद ने तवक्कुल पर कमर सौ बार चुस्त
लेकिन आख़िर बाइस-ए-सुस्ती-ए-हिम्मत खुल गई
9
खुलते खुलते रुक गए वो उन को तू ने ऐ 'ज़फ़र'
सच कहो किस आँख से देखा कि चाहत खुल गई
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