मुझे मानते सब ऐसा कि अदू भी सज्दे करते दर-ए-यार काबा बनता जो मिरा मज़ार होता

“Such reverence would I command that even foes would bow in prayer, / The beloved's threshold would become the Kaaba, were my tomb laid there.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

अगर महबूब की चौखट पर मेरी मज़ार होती, तो सब मुझे इस तरह मानते कि दुश्मन भी सजदे करते और वह दरवाज़ा काबा बन जाता।

विस्तार

इस शेर में आशिक़ अपनी मोहब्बत की इंतहा को एक ख़ूबसूरत तमन्ना के ज़रिए बयां कर रहा है। वह कहता है कि काश मेरी क़ब्र महबूब की चौखट पर बन पाती, तो वह दर काबा की तरह मुक़द्दस हो जाता। फिर तो यह आलम होता कि मेरे दुश्मन और रक़ीब भी उस मुक़ाम की अज़मत के आगे सिर झुकाने पर मजबूर हो जाते। यहाँ इश्क़ को इबादत का दर्जा देकर महबूब के दर पर फ़ना होने का अनोखा फ़ख़्र दिखाया गया है।

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