गिले शिकवे कहाँ तक होंगे आधी रात तो गुज़री परेशाँ तुम भी होते हो परेशाँ हम भी होते हैं

“How long will these grievances go on? Half the night has already passed; You too are left distressed and restless, and troubled too am I.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

आपसी शिकवे-शिकायतें आख़िर कब तक चलेंगे जबकि आधी रात तो बीत चुकी है; इस सब से तुम भी परेशान होते हो और हम भी परेशान होते हैं।

विस्तार

यह शेर दो प्यार करने वालों के बीच की उस नाज़ुक घड़ी को बयां करता है, जहाँ तकरार की वजह से कीमती रात बेचैनी में बीत रही है। शायर बहुत अपनेपन से कहता है कि अब इन शिकवों को ख़त्म करो, क्योंकि इस नाराज़गी में दिल सिर्फ़ मेरा ही नहीं, तुम्हारा भी दुख रहा है। यहाँ आधी रात का बीत जाना इस बात का अहसास दिलाता है कि बेमतलब की ज़िद में हम वो ख़ूबसूरत लम्हे गँवा रहे हैं जो सुकून और मोहब्बत से गुज़र सकते थे।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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