ग़ज़ल
आ कि मिरी जान को क़रार नहीं है
آ کہ مری جان کو قرار نہیں ہے
इस ग़ज़ल में शायर ने महबूब की जुदाई में मिलने वाले असहनीय दर्द और इंतज़ार की बेचैनी को बयां किया है। इसमें प्रिय के वियोग की तड़प के साथ-साथ मानवीय जीवन के संघर्षों और अस्तित्व के गहरे दार्शनिक पहलुओं को भी मार्मिक रूप से प्रस्तुत किया गया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
आ कि मिरी जान को क़रार नहीं है
ताक़त-ए-बेदाद-ए-इंतिज़ार नहीं है
चले आओ क्योंकि मेरी जान को चैन नहीं है, और अब मुझमें इंतज़ार का ज़ुल्म सहने की ताक़त नहीं बची है।
2
देते हैं जन्नत हयात-ए-दहर के बदले
नश्शा ब-अंदाज़ा-ए-ख़ुमार नहीं है
वे इस सांसारिक जीवन के बदले जन्नत देते हैं, लेकिन मिलने वाला नशा उस ख़ुमार और कष्ट के अनुपात में नहीं है।
3
गिर्या निकाले है तेरी बज़्म से मुझ को
हाए कि रोने पे इख़्तियार नहीं है
मेरा रोना मुझे तुम्हारी महफ़िल से बाहर निकाल रहा है, और अफ़सोस इस बात का है कि अपने रोने पर मेरा कोई वश नहीं है।
4
हम से अबस है गुमान-ए-रंजिश-ए-ख़ातिर
ख़ाक में उश्शाक़ की ग़ुबार नहीं है
हमसे दिल में किसी तरह की रंजिश या मैल का गुमान करना बेकार है, क्योंकि आशिक़ों की मिट्टी में कोई मैल या ग़ुबार नहीं होता।
5
दिल से उठा लुत्फ़-ए-जल्वा-हा-ए-मआनी
ग़ैर-ए-गुल आईना-ए-बहार नहीं है
दिल से गूढ़ अर्थों और आंतरिक सच्चाइयों के जलवों का आनंद समाप्त हो गया है। अब फूल के अलावा कोई और चीज़ बहार का दर्पण नहीं रही।
6
क़त्ल का मेरे किया है अहद तो बारे
वाए अगर अहद उस्तुवार नहीं है
आखिरकार उसने मुझे कत्ल करने का वादा तो किया है, लेकिन हाय अफ़सोस अगर यह वादा पक्का और अटल न रहा।
7
तू ने क़सम मय-कशी की खाई है 'ग़ालिब'
तेरी क़सम का कुछ ए'तिबार नहीं है
हे ग़ालिब, तुमने शराब छोड़ने की क़सम तो खाई है, लेकिन तुम्हारी इस क़सम पर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता।
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