याँ सर-ए-पुर-शोर बे-ख़्वाबी से था दीवार-जू
वाँ वो फ़र्क़-ए-नाज़ महव-ए-बालिश-ए-किम-ख़्वाब था
“Here, my restless, sleepless head sought refuge in the wall, While there, that delicate brow was lost in a silken pillow's thrall.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
यहाँ मेरा शोर-भरा, नींद से रहित सिर दीवार को खोज रहा था। वहाँ, वह नाज़ुक माथा रेशमी तकिये में लीन था।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
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