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आदमी के रेशे रेशे में समा जाता है इश्क़ शाख़-ए-गुल में जिस तरह बाद-ए-सहर-गाही का नम

Love permeates the very essence of man, just as the morning breeze's dampness settles into the flower's branch.

अल्लामा इक़बाल
अर्थ

इश्क़ आदमी के हर रेशे में बस जाता है, ठीक वैसे ही जैसे सुबह की हवा की नमी फूल की टहनी में समा जाती है।

विस्तार

यह शेर बताता है कि इश्क़ कितना गहरा होता है। शायर कहते हैं कि प्यार किसी बाहरी चीज़ जैसा नहीं है, बल्कि यह आदमी के हर रेशे में समा जाता है। यह बिल्कुल वैसा ही है, जैसे सुबह की ओस की नमी फूलों की शाख़ पर ठहर जाती है। यह एक प्राकृतिक, रूहानी एहसास है जो हर पल आपके साथ रहता है।

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