ईमान-ओ-कुफ़्र और न दुनिया-ओ-दीं रहे ऐ इश्क़-ए-शाद-बाश कि तन्हा हमीं रहे

“Neither faith nor disbelief, nor worldly life nor creed remains; Hail to you, O joyous Love, for now we alone remain!”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

अब न ईमान और कुफ़्र बचा है और न दुनिया व धर्म; ऐ इश्क़, तू आबाद व ख़ुश रह कि अब केवल हम ही बाकी रह गए हैं।

विस्तार

इस ख़ूबसूरत शेर में इश्क़ को एक ऐसी ताक़त के रूप में दिखाया गया है, जो दुनिया के सारे बंधनों और दायरों को मिटा देती है। यहाँ ईमान और कुफ़्र या दुनिया और मज़हब जैसी तमाम दूरियाँ ख़त्म हो जाती हैं और सिर्फ़ एक गहरा, सच्चा एहसास बचता है। शायर इश्क़ को मुबारकबाद देता है कि उसने सब कुछ मिटाकर इंसान को अपनी ही रूह के साथ मुकम्मल और तन्हा कर दिया।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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