साईं इतना दीजिये , जा मे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूँ , साधु ना भूखा जाय॥
“Oh Sai, please grant us enough to maintain our family. Let us not remain hungry, and may the visiting ascetic also not go hungry.”
— कबीर
अर्थ
हे साईं, इतना दीजिए कि हमारा परिवार चल जाए। मैं भी भूखा न रहूँ और न ही कोई अतिथि (साधु) भूखा जाए।
विस्तार
यह दोहा कबीरदास जी की विनम्रता और उदारता को दर्शाता है। इसमें साईं से केवल उतना ही मांगा गया है जिससे परिवार का भरण-पोषण हो सके और कोई भूखा न रहे। यह सिर्फ अपनी जरूरत पूरी करने की बात नहीं, बल्कि आने वाले मेहमान या साधु की सेवा करने की भावना को भी दर्शाता है। कबीर जी सिखाते हैं कि सच्चा संतोष बहुत अधिक धन में नहीं, बल्कि पर्याप्तता और दूसरों के साथ साझा करने में है।
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