गाँठि न थामहिं बाँध ही , नहिं नारी सो नेह। कह कबीर वा साधु की , हम चरनन की खेह॥ 182॥
“Neither does a knot hold, nor does a woman's affection. What Kabir says, O saint, is that we are in the river of your feet.”
— कबीर
अर्थ
कबीर कहते हैं कि न तो कोई गाँठ बांधे जा सकता है और न ही स्त्री का प्रेम। वे कहते हैं कि हम तो आपके चरणों की नदी में हैं।
विस्तार
कबीर दास जी यहाँ समझाते हैं कि जीवन में न कोई गांठ हमेशा बंधे रहती है और न ही रिश्तों का प्रेम स्थायी होता है। ये सब संसार के अस्थायी बंधन हैं, जो अंततः छूट ही जाते हैं। वे कहते हैं कि सच्चा सहारा और स्थायी शांति तो उस साधु के चरणों की धूल में मिलती है, जहाँ हम अपना सब कुछ समर्पित कर देते हैं।
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