“The one who leaves with humility, conflict and distress will cease. The one who walks with the saintly demeanor, is truly virtuous; the one who walks with greed, is base.”
जो व्यक्ति विनम्रता और कष्ट त्यागकर चला जाता है, संघर्ष और परेशानी भी समाप्त हो जाती है। जो साधु जैसा व्यवहार करता है, वह वास्तव में virtuous होता है; और जो लालच से चलता है, वह नीच होता है।
कबीरदास जी इस दोहे में हमें जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाते हैं। वे कहते हैं कि कड़वे बोल और वाद-विवाद ही झगड़े, परेशानी और मन की तंगी को जन्म देते हैं। जो व्यक्ति ऐसे झगड़ों से दूर हट जाता है और अहंकार छोड़कर विनम्रता से पेश आता है, वही सच्चा साधु है। इसके विपरीत, जो इनमें उलझा रहता है और जिद पर अड़ा रहता है, उसकी प्रवृत्ति नीच मानी जाती है, क्योंकि सच्ची शांति और संतोष त्याग में ही है।
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