“This body is a creeper of poison, yet a mine of the Guru's nectar. Even if one sacrifices their head to meet the Guru, consider it cheap.”
यह शरीर विष की बेल की तरह है, लेकिन यह गुरु के अमृत का भंडार भी है। यदि गुरु से मिलने के लिए अपना सिर भी बलिदान करना पड़े, तो भी उसे कम समझना चाहिए।
यह दोहा हमें समझाता है कि हमारा शरीर तो नश्वर और विकारों से भरा है, मानो विष की बेल हो। पर गुरु का ज्ञान अमृत के खज़ाने जैसा है, जो हमें सच्चा जीवन देता है। कबीर दास जी कहते हैं कि अगर ऐसे गुरु को पाने के लिए हमें अपना सिर भी देना पड़े, तो भी उसे सस्ता ही समझना चाहिए। क्योंकि गुरु का मार्गदर्शन हमें संसार के मोह-माया से ऊपर उठाकर मुक्ति की राह दिखाता है, जिसका मूल्य किसी भी बलिदान से कहीं ज़्यादा है।
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