कबीरा राम रिझाइ लै , मुखि अमृत गुण गाइ। फूटा नग ज्यूं जोड़ि मन , संधे संधि मिलाइ॥ 251॥
“Like Kabir, who sang the nectar-like praise of Rama, he mended the heart like a broken lute, uniting the scattered parts of the mind.”
— कबीर
अर्थ
कबीर की तरह, जिसने राम की अमृतमयी महिमा का गुणगान किया, उसने टूटे हुए वीणा की तरह मन को जोड़ा और बिखरे हुए मन के हिस्सों को मिला दिया।
विस्तार
कबीर जी यहाँ हमें समझा रहे हैं कि राम के अमृत-जैसे गुणों का बखान करके, हम न सिर्फ उन्हें प्रसन्न करते हैं, बल्कि अपने मन को भी शांति देते हैं। जैसे एक टूटे हुए साज या नग को फिर से जोड़ा जाता है, वैसे ही भक्ति के इस मीठे रस से हमारा मन भी जुड़कर एकाग्र और शांत हो जाता है। यह बिखरे हुए विचारों को समेटकर एक नई पूर्णता और आत्मिक संतोष पाने का तरीका है।
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