“Speak such words, losing the ego of the mind; They soothe others, and grant coolness to the self.”
ऐसी वाणी बोलनी चाहिए कि जिससे मन का अहंकार दूर हो जाए। ऐसी वाणी दूसरों को शीतलता प्रदान करती है और स्वयं को भी शांत करती है।
कबीर दास जी यहाँ कितनी प्यारी बात सिखा रहे हैं कि हमें अपनी वाणी में से 'मैं' का अहंकार बिल्कुल मिटा देना चाहिए। जब हम नम्रता और प्रेम से बोलते हैं, तो हमारे शब्द सुनने वालों को इतनी शीतलता और सुकून देते हैं, जैसे तपती धूप में ठंडी हवा का झोंका हो। पर जानते हैं, इसका सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि ऐसी मीठी बोली न सिर्फ दूसरों को राहत देती है, बल्कि बोलने वाले के मन को भी गहरा सुकून और शांति प्रदान करती है। यह हमें सिखाता है कि मन की सच्ची शांति, हमारे बोले गए शब्दों में ही छिपी है।
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