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निंदक नियारे राखिये , आंगन कुटि छबायबिन पाणी बिन सबुना , निरमल करै सुभाय421

Keep your critics near, in the courtyard corner. They purify your nature, without water or soap.

कबीर
अर्थ

निंदक को पास रखना चाहिए, जैसे आंगन के कोने में कुटिया बनाना। वह बिना पानी या साबुन के ही स्वभाव को स्वच्छ कर देता है।

विस्तार

कबीर जी यहाँ कितनी गहरी बात कह रहे हैं कि अपने आलोचकों को, यानि अपनी कमियाँ बताने वालों को, हमेशा अपने पास रखना चाहिए, मानो आँगन में उनके लिए एक छोटी सी कुटिया ही बना दी हो। यह सिर्फ निंदा सुनने की बात नहीं है, बल्कि यह समझना है कि उनकी बातें हमें बिना पानी और साबुन के ही भीतर से निर्मल कर देती हैं। जैसे गंदे कपड़े धोने के लिए पानी और साबुन चाहिए, वैसे ही हमारी आत्मा और स्वभाव को शुद्ध करने के लिए ये आलोचनाएँ एक अनोखे साबुन की तरह काम करती हैं, जो हमें बेहतर बनने की प्रेरणा देती हैं।

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निंदक नियारे राखिये , आंगन कुटि छबाय। बिन पाणी बिन सबुना , निरमल करै सुभाय॥ 421॥ | Sukhan AI