“The form of the Guru is like the Moon, and the servant's eyes are like the Chakora bird. They keep watching, for eight cycles of time, the direction of the Guru's form.”
गुरु की मूर्ति चंद्रमा के समान है, और सेवक की आँखें चकोर पक्षी जैसी हैं। वे आठ पहर तक गुरु की मूर्ति की ओर देखते रहते हैं।
अरे वाह, इस दोहे में कबीर साहब ने गुरु और शिष्य के पवित्र रिश्ते को कितने प्यारे ढंग से समझाया है! यहाँ गुरु की छवि को चाँद से और भक्त की आँखों को चकोर पक्षी से जोड़ा गया है। जैसे चकोर पूरी रात चाँद को निहारता रहता है, वैसे ही सच्चा शिष्य हर पल गुरु के रूप और उनकी शिक्षाओं में ही लीन रहता है। यह हमें बताता है कि गुरु के प्रति निष्ठा और प्रेम कितना गहरा और अटूट होना चाहिए।
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