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ग़ज़ल

कबीर 451-460

کبیر 451-460
कबीर· Ghazal· 10 shers

कबीर की यह ग़ज़ल भ्रम और अहंकार को त्यागकर आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त करने के महत्व पर ज़ोर देती है। यह गहन अज्ञान को दूर करने में गुरु की अपरिहार्य भूमिका को रेखांकित करती है, यह दर्शाती है कि सच्चा ज्ञान और कल्याण गुरु के प्रति पूर्ण भक्ति और समर्पण से ही प्राप्त होता है।

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1
कहैं कबीर जजि भरम को , नन्हा है कर पीवतजि अहं गुरु चरण गहु , जमसों बाचै जीव454
कबीर कहते हैं कि भ्रम को त्याग देना और छोटे से प्याले (या मोह) को छोड़ देना चाहिए। अहंकार को त्याग कर गुरु के चरणों को ग्रहण करने से जीव (आत्मा) निश्चित रूप से बच जाता है।
2
कोटिन चन्दा उगही , सूरज कोटि हज़ारतीमिर तौ नाशै नहीं , बिन गुरु घोर अंधार455
कोटि चन्दा उगही, सूरज कोटि हज़ार। तीमिर तौ नाशै नहीं, बिन गुरु घोर अंधार। इसका अर्थ है कि भले ही लाखों सिक्के और हजारों सूरज मिल जाएं, लेकिन गुरु के बिना घना अंधेरा दूर नहीं हो सकता।
3
तबही गुरु प्रिय बैन कहि , शीष बढ़ी चित प्रीतते रहियें गुरु सनमुखाँ कबहूँ दीजै पीठ456
उस समय गुरु ने प्रिय वचन कहे, और मेरा हृदय प्रेम से भर गया। हे गुरु, मुझे कभी आपके सान्निध्य से दूर न जाने दें।
4
तन मन शीष निछावरै , दीजै सरबस प्रानकहैं कबीर गुरु प्रेम बिन , कितहूँ कुशल नहिं क्षेम457
शरीर, मन और सिर का बलिदान करते हुए, मुझे अपना संपूर्ण जीवन दीजिए। कबीर कहते हैं कि गुरु के प्रेम के बिना, कहीं भी कोई सुरक्षा या शांति नहीं है।
5
जो गुरु पूरा होय तो , शीषहि लेय निबाहिशीष भाव सुत्त जानिये , सुत ते श्रेष्ठ शिष आहि458
यदि गुरु पूर्ण हो तो वह शिष्य का मार्गदर्शन करता है। सिर के भाव का सच्चा अर्थ जानना चाहिए; पुत्र सर्वश्रेष्ठ शिष्य होता है।
6
भौ सागर की त्रास तेक , गुरु की पकड़ो बाँहिगुरु बिन कौन उबारसी , भौ जल धारा माँहि459
हे भौं, सागर के भय से गुरु का सहारा पकड़ो। गुरु के बिना कौन इस बहती जलधारा से पार लगाएगा।
7
करै दूरि अज्ञानता , अंजन ज्ञान सुदेयबलिहारी वे गुरुन की हंस उबारि जुलेय460
गुरु से अज्ञानता दूर हो जाती है और ज्ञान का दीपक प्राप्त होता है। मैं उन गुरुओं को नमन करता हूँ जो हंस को बचाते हैं।
8
सुनिये सन्तों साधु मिलि , कहहिं कबीर बुझायजेहि विधि गुरु सों प्रीति छै कीजै सोई उपाय461
सुनिए संतों और साधुओं, कबीर कहते हैं कि गुरु से प्रेम करने का जो भी तरीका है, वही उपाय करना चाहिए।
9
अबुध सुबुध सुत मातु पितु , सबहि करै प्रतिपालअपनी और निबाहिये , सिख सुत गहि निज चाल462
अबुध, सुबुध, सुत, मातु, पितु - ये सब को पालने वाला (पालन करने वाला) है। अपनी और अपने संबंधी को निभाओ, और अपनी राह पर चलो।
10
लौ लागी विष भागिया , कालख डारी धोयकहैं कबीर गुरु साबुन सों , कोई इक ऊजल होय463
लौ लगी विष से शरीर दागदार हो गया है, और समय ने उसे धो दिया है। कबीर कहते हैं कि हे गुरु, साबुन से कुछ शुद्ध जल होना चाहिए।
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