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साबुन बिचारा क्या करे , गाँठे राखे मोयजल सो अरसां नहिं , क्यों कर ऊजल होय465

Poor soap, what can you do? You keep your knots (or: your secrets/attachments) close. Neither water nor time is sufficient; why do you become watery?

कबीर
अर्थ

साबुन बेचारा क्या करे, गाँठें रखे मोय। जल सो अरसां नहिं, क्यों कर ऊजल होय॥ इसका अर्थ है कि बेचारा साबुन क्या कर सकता है, जो अपनी गाँठें/Secrets अपने अंदर रखता है। न तो जल से और न ही समय से यह ठीक हो सकता है, तो यह क्यों पानी जैसा हो जाता है।

विस्तार

यहाँ साबुन खुद से पूछ रहा है कि वह क्या करे, क्योंकि उसने अपने भीतर ही अपनी गाँठें यानी पुरानी उलझनें या गहरे लगाव बाँध रखे हैं। वह कहता है कि न तो पानी से और न ही समय से ये गाँठें खुलती हैं, तो फिर वो कैसे स्वच्छ या निर्मल हो? यह दोहा हमें बहुत प्यारी बात समझाता है कि जब तक हम अपनी अंदरूनी उलझनों को खुद नहीं सुलझाते, तब तक बाहरी प्रयास अक्सर बेकार ही साबित होते हैं।

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