“How many books have you read, how many sacrifices made, or how much asceticism practiced? Without the True Guru, one cannot find it, no matter how many remedies are employed.”
कितनी किताबें पढ़ीं, कितने यज्ञ किए, या कितना तप किया? बिना सच्चे गुरु के, यह पाना संभव नहीं, चाहे कितने भी उपाय किए जाएं।
कबीर दास जी यहाँ समझाना चाहते हैं कि कितनी भी किताबें पढ़ लो, कितने ही यज्ञ-तप कर लो, ये सब बाहरी उपाय सच्चे ज्ञान तक नहीं ले जा सकते। वे कहते हैं कि बिना सद्गुरु की कृपा और मार्गदर्शन के, आत्मज्ञान की प्राप्ति असंभव है, चाहे हम लाखों यत्न क्यों न कर लें। यह दोहा हमें याद दिलाता है कि असली मंजिल बाहरी कर्मकांडों में नहीं, बल्कि गुरु द्वारा दिखाए गए भीतर के मार्ग को पहचानने में है।
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