ऐसी वाणी बोलेए , मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे , आपहु शीतल होय॥ 34॥
“Speak such words, losing the self's ego, That cool the minds of others, and cool the self too.”
— कबीर
अर्थ
ऐसी वाणी बोलनी चाहिए, जिसमें अहंकार न हो। ऐसी वाणी दूसरों को शांति देती है और स्वयं को भी शीतलता प्रदान करती है।
विस्तार
कबीर दास जी हमें समझाते हैं कि हमारी वाणी ऐसी मधुर और शांत होनी चाहिए, जैसे ठंडी हवा का झोंका। जब हम अपने मन के अहंकार को त्यागकर बोलते हैं, तो हमारे शब्द न केवल दूसरों के हृदयों को शीतलता प्रदान करते हैं, बल्कि हमें खुद को भी आंतरिक शांति और सुकून का अनुभव कराते हैं। यह बस जुबान का खेल नहीं, बल्कि दिल की सच्चाई है जो चारों ओर प्रेम और सौहार्द फैलाती है।
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