राम रहे बन भीतरे गुरु की पूजा ना आस। रहे कबीर पाखण्ड सब , झूठे सदा निराश॥ 47॥
“Whether Rama remains within the forest, or the worship of the Guru is absent, desire is not. Kabir, all hypocrisy, always false, in despair.”
— कबीर
अर्थ
चाहे राम वन में रहें या गुरु की पूजा में आस, कबीर कहते हैं कि सब पाखण्ड झूठे हैं और सदा निराश करते हैं।
विस्तार
यह दोहा हमें सिखाता है कि भगवान राम वन में हों या गुरु की पूजा का कोई बाहरी आसरा न हो, सच्चा संबंध इन बातों पर निर्भर नहीं करता। कबीर दास जी कहते हैं कि दिखावा और पाखंड हमेशा मन को निराशा ही देते हैं। असली भक्ति तो हृदय की ईमानदारी और अंदरूनी सच्चाई में ही छिपी है, ऊपरी आडंबरों में नहीं।
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