“A sapling has been planted in the soil of water; it must be watered a hundred times. When will the world, O Kabir, cease its delusion?”
जल की जिस ज़मीन में पौधा लगाया गया है, उसे अभी सौ बार सींचना होगा। हे कबीर, यह दुनिया कब तक अपने भ्रम में डूबी रहेगी?
कबीर दास जी यहाँ एक बहुत सुंदर और गहरा रूपक इस्तेमाल कर रहे हैं। 'जल की जमीं' में पौधा रोपने का मतलब है कि हमारा मन या संसार दिखने में तो हरा-भरा लगता है, पर इसकी नींव स्थिर नहीं है, यह एक तरह का भ्रम है। इस नाजुक पौधे, यानी हमारी आत्मा या चेतना को जगाने के लिए बार-बार, सौ बार सींचने की जरूरत है। कबीर कहते हैं कि इस भ्रम से बाहर आने के लिए लगातार प्रयास और साधना ही सच्चा मार्ग है, तभी दुनिया अपनी मोह-माया से बाहर आएगी।
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