उन आईना-रूयों के क्या 'मीर' भी आशिक़ हैं जब घर से निकलते हैं हैरान निकलते हैं

“What are the 'Meer' (the lovers) of those mirror-like faces, When they leave home, they appear bewildered.”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

उन आईना-रूयों के क्या 'मीर' भी आशिक़ हैं, जब घर से निकलते हैं हैरान निकलते हैं। इसका अर्थ है कि उन आईने जैसे चेहरों के प्रेमी कौन हैं, जो घर से निकलते समय हैरान या विस्मय में दिखाई देते हैं।

विस्तार

यह शेर बाहरी खूबसूरती और अंदर की हकीकत के फर्क को समझाता है। शायर कह रहे हैं कि आप उन चेहरों से क्या उम्मीद कर सकते हैं जो आईने जैसे हैं—बहुत सुंदर, पर क्षणभंगुर। वे जब घर से निकलते हैं, तो ऐसे दिखते हैं जैसे खुद को पहचान न पाए हों। यह जीवन की उस सच्चाई को दर्शाता है, जहाँ बाहरी दिखावा अक्सर हमारी असली पहचान को छुपा देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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