वर्ना ऐ शैख़-ए-शहर वाजिब थी
जाम-दारी शराब-ख़ाने की
“Otherwise, the Sheikh of the city was indispensable To the custodianship of the tavern's wine”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
वरना ऐ शहर के शेख, शराबखाने की जामदारी वाजिब थी।
विस्तार
यह शेर एक बहुत गहरी बात कहता है.... कि शहर में किसी बड़े या प्रतिष्ठित व्यक्ति के लिए शराब-ख़ाने में जाना सिर्फ़ एक आदत नहीं थी, बल्कि एक ज़रूरत थी! शायर बता रहे हैं कि समाज में अपनी जगह बनाने के लिए, आपको एक ख़ास किरदार निभाना पड़ता था.... ऐसा लगता है जैसे जीना ही एक ज़िम्मेदारी बन गई थी।
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