ও মা, অঘ্রানে তোর ভরা ক্ষেতে আমি কী দেখেছি মধুর হাসি॥ কী শোভা, কী ছায়া গো, কী স্নেহ, কী মায়া গো—

“ও মা, অঘ্রানে তোর ভরা ক্ষেতে আমি কী দেখেছি মধুর হাসি॥ কী শোভা, কী ছায়া গো, কী স্নেহ, কী মায়া গো—”

— रवींद्रनाथ टैगोर
अर्थ

ओ माँ, अगहन में तुम्हारे लहलहाते खेतों में मैंने कैसी मधुर मुस्कान देखी है! क्या अनुपम शोभा, कैसी शीतल छाया, कितना स्नेह और कैसी मोहक माया है।

विस्तार

यह दोहा मातृभूमि की सुंदरता और प्रचुरता के प्रति एक हार्दिक श्रद्धांजलि है, जिसे अक्सर माँ के रूप में दर्शाया जाता है। कवि अगहन के महीने में, जब खेत पकी हुई फसलों से भरे होते हैं, अपनी मातृभूमि के हरे-भरे खेतों में एक "मधुर मुस्कान" देखता है। यह मुस्कान केवल फसलों के बारे में नहीं है; यह उस गहरे आनंद और समृद्धि का प्रतीक है जो यह भूमि प्रदान करती है। कवि फिर कहता है, "क्या शोभा, क्या शांति, क्या स्नेह, क्या माया है!" यह प्रकृति के समग्र अनुभव का उत्सव है - इसकी दृश्य सुंदरता, यह जो शांतिपूर्ण छाया प्रदान करती है, और यह देखने वाले के लिए जो गहरा भावनात्मक संबंध और जादुई आकर्षण रखती है। यह उदार भूमि के प्रति गहरे प्रेम और कृतज्ञता को व्यक्त करता है।

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