ग़ज़ल
दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ
دنیا میں ہوں دنیا کا طلب گار نہیں ہوں
यह ग़ज़ल सांसारिक आकर्षणों और भौतिक इच्छाओं से गहरी विरक्ति एवं उदासीनता को व्यक्त करती है। शायर स्वयं को जीवन के बाज़ार से गुज़रने वाला एक ऐसा राहगीर बताता है, जो दुनिया में मौजूद होकर भी उसकी चमक-दमक और वासनाओं से पूरी तरह बेपरवाह है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ
बाज़ार से गुज़रा हूँ ख़रीदार नहीं हूँ
मैं इस दुनिया में रहता ज़रूर हूँ लेकिन मुझे इस सांसारिक सुखों की कोई चाहत नहीं है। मैं बाज़ार से गुज़रा तो हूँ, लेकिन किसी चीज़ का ख़रीदार नहीं हूँ।
2
ज़िंदा हूँ मगर ज़ीस्त की लज़्ज़त नहीं बाक़ी
हर-चंद कि हूँ होश में हुश्यार नहीं हूँ
मैं जीवित तो हूँ लेकिन जीवन का आनंद बाक़ी नहीं रहा; हालाँकि मैं होश में हूँ, फिर भी सचेत और सावधान नहीं हूँ।
3
इस ख़ाना-ए-हस्ती से गुज़र जाऊँगा बे-लौस
साया हूँ फ़क़त नक़्श-ब-दीवार नहीं हूँ
मैं इस जीवन-रूपी घर से बिना किसी दाग या सांसारिक लगाव के गुज़र जाऊँगा। मैं सिर्फ़ एक गुज़रता हुआ साया हूँ, दीवार पर उकेरा गया कोई स्थायी चित्र नहीं।
4
अफ़्सुर्दा हूँ इबरत से दवा की नहीं हाजत
ग़म का मुझे ये ज़ोफ़ है बीमार नहीं हूँ
मैं नसीहत और हक़ीक़त देखकर उदास हूँ, मुझे दवा की कोई ज़रूरत नहीं है। मेरी यह कमज़ोरी ग़म की वजह से है, मैं बीमार नहीं हूँ।
5
वो गुल हूँ ख़िज़ाँ ने जिसे बर्बाद किया है
उलझूँ किसी दामन से मैं वो ख़ार नहीं हूँ
मैं वह फूल हूँ जिसे पतझड़ ने बर्बाद कर दिया है, मैं वह काँटा नहीं हूँ जो किसी के दामन से उलझ जाए।
6
या रब मुझे महफ़ूज़ रख उस बुत के सितम से
मैं उस की इनायत का तलबगार नहीं हूँ
हे ईश्वर, मुझे उस महबूब के ज़ुल्म व सितम से सुरक्षित रख; मुझे उसकी किसी कृपा या मेहरबानी की भी कोई चाह नहीं है।
7
गो दावा-ए-तक़्वा नहीं दरगाह-ए-ख़ुदा में
बुत जिस से हों ख़ुश ऐसा गुनहगार नहीं हूँ
भले ही ईश्वर के दरबार में मुझे अपनी परहेज़गारी का कोई दावा नहीं है, लेकिन मैं ऐसा गुनहगार भी नहीं हूँ जिससे बुत ख़ुश हो जाएँ।
8
अफ़्सुर्दगी ओ ज़ोफ़ की कुछ हद नहीं 'अकबर'
काफ़िर के मुक़ाबिल में भी दीं-दार नहीं हूँ
ऐ अकबर, मेरी उदासी और कमज़ोरी की कोई सीमा नहीं है; यहाँ तक कि किसी काफ़िर के सामने भी मैं ख़ुद को सच्चा धर्मनिष्ठ साबित नहीं कर पाता।
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