इस ख़ाना-ए-हस्ती से गुज़र जाऊँगा बे-लौस साया हूँ फ़क़त नक़्श-ब-दीवार नहीं हूँ

“I shall pass unstained through this abode of existence; I am merely a passing shadow, not a carving etched upon the wall.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

मैं इस जीवन-रूपी घर से बिना किसी दाग या सांसारिक लगाव के गुज़र जाऊँगा। मैं सिर्फ़ एक गुज़रता हुआ साया हूँ, दीवार पर उकेरा गया कोई स्थायी चित्र नहीं।

विस्तार

शायर इस शेर में ज़िंदगी को एक मुसाफ़िरख़ाने की तरह देखते हैं, जहाँ ठहरना हमेशा के लिए नहीं है। वे खुद को दीवार पर उकेरी गई कोई पक्की तस्वीर नहीं, बल्कि एक गुज़रता हुआ साया मानते हैं, जो किसी चीज़ से उलझता नहीं। इसका गहरा मतलब यह है कि वे इस दुनिया में रहते हुए भी इसके लालच, दाग़ और बंधनों से बिल्कुल बेदाग़ और आज़ाद होकर निकल जाना चाहते हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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