ग़ज़ल

ग़म्ज़ा नहीं होता कि इशारा नहीं होता

غمزہ نہیں ہوتا کہ اشارا نہیں ہوتا
अकबर इलाहाबादी· Ghazal· 6 shers· radif: नहीं होता

यह ग़ज़ल महबूब की शोखियों, नज़रों के इशारों और इश्क के गहरे जज़्बात को खूबसूरती से बयां करती है। शायर ज़ाहिरी हुस्न के बजाय रूहानी और मानीखेज़ सुंदरता पर ज़ोर देता है, जिससे दिलो-दिमाग पर गहरा असर पड़ता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
ग़म्ज़ा नहीं होता कि इशारा नहीं होता आँख उन से जो मिलती है तो क्या क्या नहीं होता
ऐसा कौन सा नाज़-ओ-अंदाज़ या इशारा है जो नहीं होता; जब उनसे नज़रें मिलती हैं, तो भला क्या-क्या नहीं हो जाता।
2
जल्वा न हो मा'नी का तो सूरत का असर क्या बुलबुल गुल-ए-तस्वीर का शैदा नहीं होता
यदि आंतरिक अर्थ या वास्तविकता की चमक न हो तो केवल बाहरी रूप का कोई प्रभाव नहीं होता, जैसे बुलबुल तस्वीर में बने फूल पर कभी मोहित नहीं होती।
3
अल्लाह बचाए मरज़-ए-इश्क़ से दिल को सुनते हैं कि ये आरिज़ा अच्छा नहीं होता
ईश्वर दिल को प्यार की बीमारी से सुरक्षित रखे, क्योंकि सुना है कि यह मर्ज़ अच्छा नहीं होता।
4
तश्बीह तिरे चेहरे को क्या दूँ गुल-ए-तर से होता है शगुफ़्ता मगर इतना नहीं होता
मैं तुम्हारे चेहरे की तुलना ताज़ा खिले गुलाब से कैसे करूँ? गुलाब खिलता ज़रूर है, मगर तुम्हारे चेहरे जितना नहीं खिलता।
5
मैं नज़्अ' में हूँ आएँ तो एहसान है उन का लेकिन ये समझ लें कि तमाशा नहीं होता
मैं अपनी अंतिम सांसें ले रहा हूँ, अगर वे मिलने आएँ तो उनका एहसान होगा। लेकिन वे यह समझ लें कि किसी की मौत का मंज़र कोई तमाशा नहीं होता।
6
हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता
अगर हम सिर्फ़ आह भी भरते हैं तो बदनाम हो जाते हैं, जबकि वे क़त्ल भी कर दें तो उसकी कोई चर्चा तक नहीं होती।
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