कहाँ वो अब लुत्फ़-ए-बाहमी है मोहब्बतों में बहुत कमी है चली है कैसी हवा इलाही कि हर तबीअत में बरहमी है

“Where now is that mutual joy of old, when love has grown so scarce and slight? What strange wind blows, O God, that every soul is tossed in troubled plight?”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

अब आपस का वह प्रेम और आनंद कहाँ रहा, मोहब्बतों में बहुत कमी आ गई है। हे ईश्वर, यह कैसी हवा चली है कि हर किसी के स्वभाव में बेचैनी और नाराजगी है।

विस्तार

इस शेर में शायर समाज में कम होती आत्मीयता और प्यार पर गहरा अफ़सोस जताते हैं। 'हवा' का रूपक यहाँ उस अदृश्य सामाजिक बदलाव को दर्शाता है, जिसने लोगों के दिलों से सुकून छीनकर वहाँ चिड़चिड़ापन और बेचैनी भर दी है। यह एक दर्द भरा सवाल है कि आखिर हमारे रिश्तों का वो पुराना अपनापन और सहज मिठास कहाँ खो गई।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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