“By the grace of God, the commerce of love and beauty still thrives as of old: she is never remiss in practicing cruelty, nor does my heart's blood ever run cold.”
ईश्वर की कृपा से रूप और प्रेम का यह सिलसिला आज भी वैसे ही फल-फूल रहा है; न तो महबूब जुल्म ढाने में कोई कमी छोड़ता है और न ही यहाँ दिल के ख़ून की कोई कमी है।
इस शेर में शायर बड़े ही दिलकश और हल्के-फुल्के तंज़िया अंदाज़ में इश्क़ को एक ख़ूब फलते-फूलते कारोबार की तरह पेश कर रहे हैं। वे कहते हैं कि ख़ुदा के करम से मोहब्बत की यह रौनक़ आज भी क़ायम है—महबूब सितम ढाने में ज़रा भी पीछे नहीं हटता, और आशिक़ के पास सहने के लिए अपने दिल के ख़ून की कोई कमी नहीं है। यहाँ दर्द और बेरुख़ी कोई शिकवा नहीं, बल्कि इस रिश्ते को हमेशा ज़िंदा रखने वाली सबसे बड़ी ताक़त बन गए हैं।
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