कुछ पता मंज़िल-ए-मक़्सूद का पाया हम ने जब ये जाना कि हमें ताक़त-ए-रफ़्तार नहीं

“Some trace of the destined goal did we finally attain, / Only when we realized that no strength to walk remained.”

— अल्ताफ़ हुसैन हाली
अर्थ

हमें अपनी अभीष्ट मंज़िल का कुछ सुराग तभी मिला, जब हमने यह जान लिया कि अब हममें चलने की ताक़त ही नहीं बची है।

विस्तार

यह शेर ज़िंदगी और रूहानी सफ़र का एक बेहद गहरा फलसफ़ा बयान करता है। हम उम्र भर अपनी मंज़िल को पाने के लिए भागते रहते हैं, यह सोचकर कि हमारी अपनी ताक़त और कोशिश ही हमें वहां पहुँचाएगी। लेकिन शायर को मंज़िल का असली सुराग़ तभी मिलता है जब थककर उसके क़दम रुक जाते हैं और चलने की ताक़त ख़त्म हो जाती है। यानी जब इंसान अपनी ज़िद और 'मैं' को छोड़ देता है, तभी ज़िंदगी की असल हक़ीक़त और सुकून से उसका सामना होता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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