'ज़फ़र' इक बात पर दाइम वो होवे किस तरह क़ाइम जो अपनी फेरता निय्यत कभी यूँ है कभी वूँ है

“How could one ever stand steadfast, O Zafar, true to his word, whose shifting intent constantly wavers, turning now this way, now that?”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

ऐ ज़फ़र, वह व्यक्ति भला हमेशा अपनी एक बात पर कैसे क़ायम रह सकता है, जो लगातार अपनी नीयत बदलता रहता है और कभी ऐसा होता है तो कभी वैसा।

विस्तार

बहादुर शाह 'ज़फ़र' इस शेर में इंसान की चंचल और बेभरोसेमंद फ़ितरत पर एक सादा मगर गहरा सवाल उठाते हैं। वे पूछते हैं कि जो शख़्स अपनी नीयत ही पल-पल बदलता रहे, वह किसी एक वादे या रिश्ते पर हमेशा के लिए कैसे क़ायम रह सकता है? 'कभी यूँ है कभी वूँ है' का मुहावरा उस अस्थिर और बदलते मिज़ाज को दर्शाता है, जहाँ बात का कोई पक्का भरोसा नहीं होता।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठUnavailable
हिंदी अर्थUnavailable
अंग्रेज़ी अर्थUnavailable
हिंदी विस्तारUnavailable
अंग्रेज़ी विस्तारUnavailable
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.