ग़ज़ल

न दरवेशों का ख़िर्क़ा चाहिए न ताज-ए-शाहाना

نہ درویشوں کا خرقہ چاہیئے نہ تاج شاہانا

यह ग़ज़ल सांसारिक वैभव और औपचारिक वैराग्य दोनों को त्यागकर विशुद्ध ईश्वरीय प्रेम और समर्पण की पैरवी करती है। शायर केवल इतना होश मांगता है जिससे वह अपने महबूब की मुहब्बत में दीवाना रह सके, और किताबी ज्ञान से परे महबूब के हुक्म को दिल पर उकेरे हुए सत्य के रूप में देखता है।

Source: rekhta · HI

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
न दरवेशों का ख़िर्क़ा चाहिए न ताज-ए-शाहाना मुझे तो होश दे इतना रहूँ मैं तुझ पे दीवाना
2
किताबों में धरा है क्या बहुत लिख लिख के धो डालीं हमारे दिल पे नक़्श-ए-कल-हज्र है तेरा फ़रमाना
3
ग़नीमत जान जो दम गुज़रे कैफ़ियत से गुलशन में दिए जा साक़ी-ए-पैमाँ-शिकन भर भर के पैमाना
4
न देखा वो कहीं जल्वा जो देखा ख़ाना-ए-दिल में बहुत मस्जिद में सर मारा बहुत सा ढूँडा बुत-ख़ाना
5
कुछ ऐसा हो कि जिस से मंज़िल-ए-मक़्सूद को पहुँचूँ तरीक़-ए-पारसाई होवे या हो राह-ए-रिंदाना
6
ये सारी आमद-ओ-शुद है नफ़स की आमद-ओ-शुद पर इसी तक आना जाना है न फिर जाना न फिर आना
7
'ज़फ़र' वो ज़ाहिद-ए-बेदर्द की हू-हक़ से बेहतर है करे गर रिंद दर्द-ए-दिल से हाव-हु-ए-मस्ताना
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