“Do not deem him human, O Zafar, no matter how wise or discerning he may be; who remembers not God in moments of pleasure, and fears not God in fits of fury.”
ऐ ज़फ़र, उस व्यक्ति को सच्चा इंसान मत समझिए, चाहे वह कितना भी समझदार और बुद्धिमान क्यों न हो, जिसे सुख-सुविधाओं में ईश्वर की याद न रहे और ग़ुस्से में ईश्वर का डर न रहे।
ज़फ़र साहब यहाँ इंसानियत की बड़ी ख़ूबसूरत और सच्ची कसौटी पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि कोई शख़्स चाहे कितना भी अक़्लमंद या ज़हीन क्यों न हो, अगर वो ऐश और आराम में ख़ुदा की शुक्रगुज़ारी भूल जाए और ग़ुस्से के वक़्त अपने ज़मीर व ख़ुदा के ख़ौफ़ को खो दे, तो वो सच्चा इंसान नहीं है। असल इंसानियत बड़ी-बड़ी डिग्रियों या अक़्ल में नहीं, बल्कि जज़्बातों के उतार-चढ़ाव में ख़ुद पर क़ाबू रखने और नेकी पर टिके रहने में नज़र आती है।
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