ग़ज़ल

नहीं इश्क़ में इस का तो रंज हमें कि क़रार ओ शकेब ज़रा न रहा

نہیں عشق میں اس کا تو رنج ہمیں کہ قرار و شکیب ذرا نہ رہا
बहादुर शाह ज़फ़र· Ghazal· 11 shers· radif: न रहा

यह ग़ज़ल प्रेम के आध्यात्मिक और आत्म-समर्पण के भाव को दर्शाती है, जहाँ आशिक़ को चैन और सब्र खोने का कोई अफ़सोस नहीं है। अपनी 'ख़ुदी' यानी अहंकार को मिटाकर प्रेमी और प्रियतम के बीच का पर्दा हट जाता है और संसार में केवल प्रियतम का ही अस्तित्व शेष रहता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
नहीं इश्क़ में इस का तो रंज हमें कि क़रार ओ शकेब ज़रा न रहा ग़म-ए-इश्क़ तो अपना रफ़ीक़ रहा कोई और बला से रहा न रहा
2
दिया अपनी ख़ुदी को जो हम ने उठा वो जो पर्दा सा बीच में था न रहा रहे पर्दे में अब न वो पर्दा-नशीं कोई दूसरा उस के सिवा न रहा
3
न थी हाल की जब हमें ख़बर रहे देखते औरों के ऐब ओ हुनर पड़ी अपनी बुराइयों पर जो नज़र तो निगाह में कोई बुरा न रहा
4
तिरे रुख़ के ख़याल में कौन से दिन उठे मुझ पे न फ़ित्ना-ए-रोज़-ए-जज़ा तिरी ज़ुल्फ़ के ध्यान में कौन सी शब मिरे सर पे हुजूम-ए-बला न रहा
5
हमें साग़र-ए-बादा के देने में अब करे देर जो साक़ी तो हाए ग़ज़ब कि ये अहद-ए-नशात ये दौर-ए-तरब न रहेगा जहाँ में सदा न रहा
6
कई रोज़ में आज वो मेहर-लिक़ा हुआ मेरे जो सामने जल्वा-नुमा मुझे सब्र ओ क़रार ज़रा न रहा उसे पास-ए-हिजाब-ओ-हया न रहा
7
तिरे ख़ंजर ओ तेग़ की आब-ए-रवाँ हुई जब कि सबील-ए-सितम-ज़दगाँ गए कितने ही क़ाफ़िले ख़ुश्क-ज़बाँ कोई तिश्ना-ए-आब-ए-बक़ा न रहा
8
मुझे साफ़ बताए निगार अगर तो ये पूछूँ मैं रो रो के ख़ून-ए-जिगर मले पाँव से किस के हैं दीदा-ए-तर कफ़-ए-पा पे जो रंग-ए-हिना न रहा
9
उसे चाहा था मैं ने कि रोक रखूँ मिरी जान भी जाए तो जाने न दूँ किए लाख फ़रेब करोड़ फ़ुसूँ न रहा न रहा न रहा न रहा
10
लगे यूँ तो हज़ारों ही तीर-ए-सितम कि तड़पते रहे पड़े ख़ाक पे हम वले नाज़ ओ करिश्मा की तेग़-ए-दो-दम लगी ऐसी कि तस्मा लगा न रहा
11
'ज़फ़र' आदमी उस को न जानिएगा वो हो कैसा ही साहब-ए-फ़हम-ओ-ज़का जिसे ऐश में याद-ए-ख़ुदा न रही जिसे तैश में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा न रहा
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