तिरे रुख़ के ख़याल में कौन से दिन उठे मुझ पे न फ़ित्ना-ए-रोज़-ए-जज़ा तिरी ज़ुल्फ़ के ध्यान में कौन सी शब मिरे सर पे हुजूम-ए-बला न रहा

“On which day, dreaming of your face, did Judgment Day's turmoil not rise upon me? On which night, lost in thought of your dark tresses, did a host of calamities not hover over my head?”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

ऐसा कोई दिन नहीं गया जब तुम्हारे चेहरे के ख़याल में मुझ पर क़यामत की आफ़त न आई हो, और ऐसी कोई रात नहीं बीती जब तुम्हारी ज़ुल्फ़ों के ध्यान में मेरे सिर पर मुसीबतों का हुजूम न रहा हो।

विस्तार

इस शे'र में शायर ने कमाल का संतुलन साधा है—दिन का रिश्ता महबूब के रोशन चेहरे से और रात का ताल्लुक़ उसकी घनी ज़ुल्फ़ों से जोड़ा है। इश्क़ की हालत ऐसी है कि दिन में जब महबूब के चेहरे का ख़याल आता है तो क़यामत जैसी बेचैनी छा जाती है, और रात को उसकी ज़ुल्फ़ों की याद बलाओं और मुसीबतों की घटा बनकर सिर पर मंडराने लगती है। आशिक़ के लिए न दिन में कोई चैन है और न रात में कोई क़रार; मोहब्बत का हर लम्हा एक पुरदर्द इम्तिहान बन गया है।

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