“When in love's public square she strung me on the gallows high, what matters if my lifeless corpse was dragged for all to vilify?”
जब महबूब ने इश्क़ के बाज़ार में सबके सामने मुझे सूली पर चढ़ा ही दिया, तो उसके बाद रुसवाई और नुमाइश के लिए मेरी लाश को घसीटने से भी क्या फ़र्क़ पड़ता है।
इस शेर में आशिक़ अपनी मोहब्बत के चरम बलिदान और बेबाक अंदाज़ को बड़े दर्द भरे लहजे में बयां कर रहा है। वह कहता है कि जब महबूब ने इश्क़ के सरेआम बाज़ार में मुझे सूली पर चढ़ा ही दिया, तो उसके बाद रुसवाई के लिए मेरी लाश को घसीटने से अब क्या फ़र्क़ पड़ता है? जब इंसान इश्क़ में अपनी जान और आबरू सब कुछ पहले ही लुटा चुका हो, तो उसके बाद दुनिया की कोई भी जिल्लत उसे डरा नहीं सकती।
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