ग़ज़ल
पान खा कर सुर्मा की तहरीर फिर खींची तो क्या
پان کھا کر سرمہ کی تحریر پھر کھینچی تو کیا
यह ग़ज़ल उस व्यर्थता और बेबसी को दर्शाती है जब सब कुछ खो जाने या नुक़सान हो चुकने के बाद किया गया श्रृंगार और प्रयास निरर्थक सिद्ध होता है। इसमें महबूब की बेरहम अदाओं के प्रभाव और तक़दीर के आगे इंसान की लाचारी को गहरे दर्द और तंज़ के साथ व्यक्त किया गया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
पान खा कर सुर्मा की तहरीर फिर खींची तो क्या
जब मिरा ख़ूँ हो चुका शमशीर फिर खींची तो क्या
2
ऐ मुहव्विस जब कि ज़र तेरे नसीबों में नहीं
तू ने मेहनत भी पय-ए-इक्सीर फिर खींची तो क्या
3
गर खिंचे सीने से नावक रूह तू क़ालिब से खींच
ऐ अजल जब खिंच गया वो तीर फिर खींची तो क्या
4
खींचता था पाँव मेरा पहले ही ज़ंजीर से
ऐ जुनूँ तू ने मिरी ज़ंजीर फिर खींची तो क्या
5
दार ही पर उस ने खींचा जब सर-ए-बाज़ार-इश्क़
लाश भी मेरी पय-ए-तशहीर फिर खींची तो क्या
6
खींच अब नाला कोई ऐसा कि हो उस को असर
तू ने ऐ दिल आह-ए-पुर-तासीर फिर खींची तो क्या
7
चाहिए उस का तसव्वुर ही से नक़्शा खींचना
देख कर तस्वीर को तस्वीर फिर खींची तो क्या
8
खींच ले अव्वल ही से दिल की इनान-ए-इख़्तियार
तू ने गर ऐ आशिक़-ए-दिल-गीर फिर खींची तो क्या
9
क्या हुआ आगे उठाए गर 'ज़फ़र' अहसान-ए-अक़्ल
और अगर अब मिन्नत-ए-तदबीर फिर खींची तो क्या
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