खींच ले अव्वल ही से दिल की इनान-ए-इख़्तियार तू ने गर ऐ आशिक़-ए-दिल-गीर फिर खींची तो क्या

“Rein in the heart's wild bridle right from the very start; What use will pulling later be, O sorrow-stricken heart?”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

शुरुआत से ही अपने दिल के इख़्तियार की लगाम कस लो; ऐ ग़मगीन आशिक़, अगर बाद में इसे खींचा तो फिर क्या फ़ायदा होगा?

विस्तार

यहाँ शायर दिल को एक सरपट दौड़ते घोड़े की तरह देखता है, जिसकी लगाम (इनान-ए-इख़्तियार) शुरू में ही कसकर थाम लेनी चाहिए। अगर इश्क़ का जुनून एक बार पूरी तरह सवार हो गया और दिल बेकाबू होकर आगे निकल गया, तो बाद में उसे रोकने की कोशिश करना महज़ बेमानी होगा। यह उदास आशिक़ को दी गई एक सच्चे दोस्त की सलाह है कि जज़्बातों की आंधी में पूरी तरह घिरने से पहले ही खुद को संभाल लो, वरना बाद में सिर्फ़ लाचारी बचेगी।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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