चाहिए उस का तसव्वुर ही से नक़्शा खींचना देख कर तस्वीर को तस्वीर फिर खींची तो क्या

“One ought to sketch their portrait purely from imagination; what art is there in drawing a picture merely by copying one?”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

किसी का चित्र तो केवल उसकी कल्पना (तसव्वुर) से ही बनाना चाहिए; किसी तस्वीर को देखकर वैसी ही तस्वीर दोबारा बना ली तो उसमें क्या कमाल है?

विस्तार

शायर यहाँ सच्चे हुनर और गहरी मोहब्बत का फ़र्क समझा रहे हैं कि महबूब का अक्स तो दिल में बसे ख़्याल और तसव्वुर से उभरना चाहिए। किसी बनी-बनाई तस्वीर को देखकर महज़ नक़ल उतार लेना कोई बड़ा कमाल नहीं है; असली जादू तो तब है जब चाहत की शिद्दत ही काग़ज़ पर उतर आए। जब कोई रूह में इस क़दर समा जाता है, तो उसकी तस्वीर बनाने के लिए किसी बाहरी सहारे की नहीं, बस बंद आँखों के दीदार की ज़रूरत होती है।

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