जान क्या दूँ कि जानता हूँ मैं तुम ने ये चीज़ ले के दी ही नहीं

“Why should I surrender my life, when well I know: this is something you take and never return.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

मैं तुम्हें अपनी जान क्यों दूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि तुम यह चीज़ एक बार लेने के बाद कभी वापस नहीं लौटाते।

विस्तार

इस शेर में आशिक़ अपने महबूब से बड़ी नटखट और तीखी अदा के साथ मुख़ातिब है। वह 'जान' जैसी अनमोल चीज़ को किसी रोज़मर्रा के उधार की तरह पेश करता है, जिसे महबूब लेकर कभी वापस नहीं लौटाता। इस चुटीले अंदाज़ के पीछे इश्क़ का एक गहरा दर्द भी छिपा है—कि मोहब्बत में एक बार जो दिल या जान सौंप दी जाए, वो फिर कभी वापस नहीं मिलती।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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