“Just watch, O Dāgh, and see what comes to be; with patience we endure all tyranny.”
ऐ दाग़, तुम बस देखते जाओ कि आगे क्या होता है, ज़ुल्म और अत्याचार पर सब्र ही किया जाता है।
'दाग़' यहाँ खुद से ही बड़े अपनेपन से कह रहे हैं कि ज़ुल्म और सितम के सामने शिकायत करने के बजाय ज़रा सब्र रखकर देखा जाए कि आगे क्या मोड़ आता है। इश्क़ या ज़िंदगी जब ज़बरदस्ती और नाइंसाफ़ी ('जबर') की हद पार कर दे, तो उस पर ख़ामोश धीरज ('सब्र') धरना कोई कमज़ोरी नहीं बल्कि एक गहरा हौसला है। यह शेर बताता है कि शोर मचाने से ज़्यादा ताक़त इंसान के सब्र में होती है, जो आख़िरकार वक़्त और तक़दीर का रुख़ बदल ही देता है।
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