ग़ज़ल

दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना

دل لگا کر لگ گیا ان کو بھی تنہا بیٹھنا
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 7 shers· radif: याँ

यह ग़ज़ल बताती है कि प्रिय को भी, एकाकीपन देने के बाद, अंततः वही अकेलापन महसूस होता है। यह समस्त सृष्टि की क्षणभंगुरता और जिस विरोधाभासी तरीके से अन्याय करुणा जगा सकता है, उसकी पड़ताल करती है। ये शेर सामूहिक रूप से व्यापक पीड़ा और अस्तित्व के क्षणभंगुर दुख का चित्रण करते हैं।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना बारे अपनी बेकसी की हम ने पाई दाद याँ
दिल लगाने के बाद, उन्हें भी अकेले बैठना आ गया। कम से कम, यहाँ हमारी बेकसी को तो दाद मिली।
2
हैं ज़वाल-आमादा अज्ज़ा आफ़रीनश के तमाम महर-ए-गर्दूं है चराग़-ए-रहगुज़ार-ए-बाद याँ
सृष्टि के सभी घटक क्षय होने के लिए तैयार हैं। यहाँ तक कि आकाश का सूर्य भी हवा के रास्ते पर एक दीपक के समान है।
3
है तरह्हुम-आफ़रीं आराइश-ए-बे-दाद याँ अश्क-ए-चश्म-ए-दाम है हर दाना-ए-सय्याद याँ
यहाँ अन्याय का आडंबर दया उत्पन्न करता है। यहाँ शिकारी का हर दाना फंदे की आँख का आँसू है।
4
है गुदाज़-ए-मोम अंदाज़-ए-चकीदन-हा-ए-ख़ूँ नीश-ए-ज़ंबूर-ए-असल है नश्तर-ए-फ़स्साद याँ
खून के टपकने का अंदाज़ पिघले हुए मोम जैसा है। यहाँ फसादिये का नश्तर शहद की मक्खी का डंक है।
5
ना-गवारा है हमें एहसान-ए-साहब-दाैलताँ है ज़र-ए-गुल भी नज़र में जौहर-ए-फ़ौलाद याँ
हमें धनवानों के एहसान पसंद नहीं हैं। हमारी नज़र में फूल का सोना भी यहाँ फ़ौलाद का जौहर (सार) है।
6
जुम्बिश-ए-दिल से हुए हैं उक़्दा-हा-ए-कार वा कम-तरीं मज़दूर-ए-संगीं-दस्त है फ़रहाद याँ
हृदय की धड़कन से ही काम के सभी बंधन खुल गए हैं। यहाँ फ़रहाद तो बस एक सबसे छोटा पत्थर तोड़ने वाला मज़दूर है।
7
क़तरा-हा-ए-ख़ून-ए-बिस्मिल ज़ेब-ए-दामाँ हैं 'असद' है तमाशा करदनी गुल-चीनी-ए-जल्लाद याँ
असद, बलि किए गए व्यक्ति के खून की बूंदें दामन को सजा रही हैं। यहाँ जल्लाद का फूल चुनना एक देखने लायक तमाशा है।
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